मुल्लाह नसरुद्दीन को कासिद ने ख़त दिया, पूरा पढ़ा भी नहीं कि भेजने वाले का
नाम देखकर ख़त के पुर्जे-पुर्जे कर कूड़ेदान में फ़ेक दिया, उसकी इस हरकत को देख और
बुदबुदाने की आवाज़ सुन कर बीवी बोली, ‘क्या था, किसका ख़त था, जो पढ़े बिना ही फाड़
डाला?
‘अरे वही कुबड़ा ब्याजी, कमबख्त पहले कई बार लोगों के जरिये ख़बर भेज चुका था कि
आज ख़त भेजा, जाने क्या मार पडी है उस पर खुदा की, कि मुझे बुला रहा है’ मुल्लाह ने
झल्लाते हुए जवाब दिया और फिर देर तक उसे मौहल्ले की बेधड़क औरतों की तरह कोसता
रहा. अभी एक हफ्ता भी न गुजरा था कि कासिद फिर एक ख़त उसके हाथ में थमाने वाला ही
था कि उसकी बीवी ने लपक लिया. पढ़कर बोली, ‘मुल्लाह, मुझे लगता है कि तुम कुबड़े से
जाकर मिल ही आओ, वह बीमार है, न जाने कब आँख बंद हो जाये, ऐसी हालत में किसी
दुश्मन की गुहार पर भी तवज्जो दी जानी चाहिए, वैसे भी तुम्हारे पास कोई काम धंधा
तो है नहीं नाहक ही बग़दाद की गलियों के फर्श घिसते फिरते हो’.
‘मुझे नहीं जाना उस ज़ालिम के पास, मेरी अक्ल मारी गयी थी कि उससे क़र्ज़ ले बैठा,
जिसे उतारते उतारते मेरी आधी उम्र गुजर
गयी, अल्लाह अल्लाह करके अब उसका पीछा छूटा है, शक्ल भी नहीं देखनी मुझे उस मरदूद
की ...और वो उसका गाँव, कसम खुदा कि एक से एक नुक्तेनापाक आदमी उसके गाँव में हैं,
मेरे गधे पर उन्होंने क्या ज़ुल्म किया था, तुम चाहती हो मैं उसे भूल जाऊं? हरगिज़
नहीं, न मुझे कुबड़े की शक्ल देखनी है और न उसके गाँव जाना है’.
चिडचिडी जुबान में मुल्लाह एक सांस में अपना गुबार उतार कर घर से बाहर निकल
गया, उसकी बीवी कुछ कहती कि उसका मुँह खुला ही रह गया. मुल्लाह को पता था कि बात
चलेगी तो रात हो जायेगी इसलिए उसने रवानगी पकड़ ली. दिन छिपे मुल्लाह भूख से तड़पता
घर पहुंचा तो उसकी बीवी ने उसे खाना खिलाया. मुल्लाह खाना खा कर पलंग पर लेटा तो बीवी पंखा झलने लगी. उसने मौका ताड़ कर कहा.
‘देखो किन्हा रखना अच्छा नही, कुबड़ा शदीद बीमार है, जाने किस बात का बोझ उसके दिल
पर हो? क्या पता उसके दिल में मरते वक्त रहम उतर आया हो और वो गलती सुधारना चाहता
हो? हो सकता है तुम से ब्याज में ऐंठी रकम ही वापस कर दे. कुछ पैसे मिल जाएं तो घर
में दो वक्त की रोटी चल जायेगी, सारे मर्तबानों की तलियाँ अब मुँह चिढाने लगी है’
घर के मौजूदा सूरते हाल का जिक्र सुन कर मुल्लाह को रातभर नींद न आयी, सुबह नहा
धो कर, तैयार होकर पेटभर खाना खाया, अपनी गठड़ी गधे पर टांगी और रुखसती से पहले
अपनी बीवी से बोला, ‘रफीकन तेरे कहने पर जा रहा हूँ, वर्ना मेरा कोई इरादा नहीं
था. जल्दी निकलता हूँ, कुबड़े के गाँव पहुँचते-पहुँचते शाम हो जायेगी, खुदा हाफ़िज’
कुबड़ा ब्याजी उसके बचपन का मित्र हुआ करता था, दोनों एक ही उस्ताद और एक ही
मदरसे में पढ़े थे, नसरुद्दीन मुल्लाह बन गया और कुबड़े ने अपनी शारीरिक अक्षमता के
चलते व्यापारियों, गाँव और आस पास के देहात में लोगों को ब्याज पर कर्जे देने का धंधा कर लिया, कुछ ही
दिनों में वह महाजन बन बैठा. मुल्लाह की मुल्लाह गिरी कभी बहुत तेज़ दौडती तो कभी
उसका सांस फूलने लगता, एक बार ऐसे ही आड़े वक्त में उसे कुबड़ा याद आया, सोचा कि
पुराना दोस्त है मदद कर देगा, लेकिन कुबड़े ने अपने धंधे के उसूलों में दोस्ती की
परवाह किये बगैर मुल्लाह का घर, खेत, जायदाद गिरवी रखने के बदले २०० दीनार का कर्ज
मुल्लाह को बड़ी हील हुज्जतों के बाद दिया.
मुल्लाह ने मुद्दतों कुबड़े को ब्याज दिया लेकिन मूल रक़म कभी न उतरी. इत्तेफाक से
उसकी बीवी रफीकन की अम्मी मरने से पहले एक पोटली छोड़ गयी. रफीकन ने जब पोटली खोलकर
देखी तो उसमे ७०० दीनार निकले. मुल्लाह ने पहली फुर्सत में लाख लानतें देकर कुबड़े
का हिसाब साफ़ किया. जिस दिन वह अपना हिसाब
करने कुबड़े के गाँव गया तभी गाँव के कुछ लड़कों ने मुल्लाह के गधे को जुल्लाब दे
दिया. मुल्लाह दस्त लगे बीमार, अधमरे गधे के साथ तीन दिनों में गिरते पड़ते अपने घर
पहुंचा उस सफ़र के दौरान उसने कुबड़े के गाँव नसीरपुर में कभी वापस न जाने का अहद भी
किया .
नसीरपुर गाँव के मुहाने पर ही पुलिस चौकी थी, हवलदार अब्दुल्लाह ने दूर से ही
गधे पर आती हुई सवारी को ताड़ना शुरू कर दिया था. ’अबे रहमत, ये राहगीर नसीरपुर
जायेगा या सीधा निकल जायेगा’ अब्दुल्लाह ने सिपाही से पूछा, ‘हुजूर मुझे तो लगता
है ये गाँव में ही रुकेगा’ खैर थोड़ी देर में दूर से आती हुई सवारी का आकार बढ़ने
लगा. अब्दुल्लाह और रहमत एकटक गधे पर आती हुई सवारी को देखते रहे.
‘अरे ये तो मुल्लाह नसरुद्दीन लग रहा है’ अब्दुल्लाह आँखे गोल करते हुए बोला,
‘हां साहब मुझे भी वही आफ़त दिखाई दे रही है, खुदा खैर करे’. मुल्लाह ने अपना गधा
चौकी के आहते में बाँधा और अब्दुल्लाह से दुआ सलाम की. अब्दुल्लाह ढलते हुए दिन
में अपने खून ए दौरा को बढ़ाने वाली ख़बर को
खुद अपनी आँखों से देख रहा था. मालूम हुआ कि मुल्लाह की सवारी आज कुबड़े के पास ही
रुकेगी. मुल्लाह वक्त ज्यादा बर्बाद किये बिना ही गाँव की तरफ रवाना हो गया,
अब्दुल्लाह और रहमत देर तक अपना सर खुजाते उसे आँखों से ओझल होने तक देखते रहे.
मुल्लाह कुबड़े ब्याजी के घर जब पहुँचा तब दिन ढल चुका था, दरवाजे की दस्तक
सुनकर कुबड़े का सेवक आया. कुबड़ा बीमार हालत में निर्जर पड़ा था, मुल्लाह को देख कर
उठने की कोशिश करने लगा, नौकर ने सहारा देकर, कमर के नीचे जैसे तैसे तकिये लगा कर
उसे पलंग पर बैठाया. मुल्लाह को देखकर उसकी आँखों भर आयी, नौकर को इशारा करके उसने
खाने की व्यवस्था कराई. मुल्लाह जल्दी जल्दी खाना खा कर कुबड़े के सिराहने जा बैठा.
इससे पहले कि वह कुछ बातें करे , कुबड़े ने नौकर को अपने घर जाने का इशारा कर दिया.
मुल्लाह नसरुद्दीन और कुबड़ा ब्याजी देर रात तक पास बैठे खुसपुसाते रहे,
मुल्लाह ही बोलता कुबड़ा हाँ हूँ ही कर पाता, सोने से पहले उसने अपने तकिये के नीचे
से एक थैली निकाल कर मुल्लाह के हाथ में देते वक्त बहुत देर तक मुल्लाह का हाथ अपने हाथों में थामे
रखा.
अगले दिन सुबह नमाज़े फजिर में मुल्लाह ने गाँव की मस्जिद में ऐलान किया कि उसका दोस्त कुबड़ा ब्याजी बहुत बीमार है और गाँव
के प्रत्येक व्यक्ति से वह अपने किये गए अमानवीय व्यवहार, ज़ुल्म की माफ़ी मांगता
है, उसे माफ़ कर दें. कुबड़े की आख़िरी ख्वाइश यह है कि गाँव के लोग अगर उसे माफ़ कर
दे तो मरने से पहले उसके शरीर पर एक लाठी जरुर मारें, तभी कुबड़े को भरोसा होगा कि
गाँव वालों ने उसकी करतूतों के लिए उसे माफ़ कर दिया. कुबड़े ने गाँव की मस्जिद और
मदरसे को १००० दीनार दान भी दिए है, कहते हुए मुल्लाह ने एक थैली इमाम के क़दमों में डाल दी. मुल्लाह
का ऐलान एक तरफ और थैली का बोझ एक तरफ. इमाम ने थैली संभालते हुए फ़ौरन व्यवस्था कर
दी. ‘चलो भाइयो, इससे पहले कि देर हो जाये, कुबड़े की अंतिम इच्छा हमें जरुर पूरी
करनी पड़ेगी, कभी मरने के बाद उसकी रूह गाँव वालों को सताए’
इमाम की बात सुनकर सभी गाँव वाले कुबड़े ब्याजी के घर की तरफ बढे. रास्ते में
एक बुजुर्ग ने सवाल किया, कि ‘मुल्लाह की बात का भरोसा क्यों किया जाए ? कुबड़ा अगर
अभी मरा नहीं तो अपने मुँह से माफी मांगे और जो उसे कहना है अपने मुँह से कहे’.
मुल्लाह ने फ़ौरन उस बुजुर्ग बूढ़े की कलाई पकड ली, ‘जरुर, मैं आपको और इमाम
साहब को कुबड़े के पास पहले लेकर चलूँगा ताकि तुम उससे बात कर सको’
मुल्लाह गाँव के सारे हुजूम को कुबड़े के घर के बाहर खड़ा कर इमाम और बूढ़े
बुजुर्ग को लेकर कुबड़े के कमरे में दाखिल हुआ और घुसते ही कुबड़े की छड़ी हाथ में
लेकर बोला, कुबड़े, गाँव वालों ने तुझे माफ़ कर दिया और टोकन के रूप में गाँव का हर
बालिग आदमी तुझे तेरी ही छड़ी से मारने को तैयार है. चल उठ और बाहर चल’.
कुबड़े के चेहरे की सलवटों में आते जाते भावों को कोई पढ़ नहीं पाया, वह अधमरा
सा हाथ से छडी न लेने का इशारा करता हुआ कुछ बोल पाए, कि मुल्लाह बोला, ‘ठीक है तू
बाहर नहीं जा सकता, मैं उनके ही अन्दर आने का इंतज़ाम करता हूँ’.
मुल्लाह, इमाम और बुजुर्ग बूढ़े को धकेलते हुए कुबड़े के कमरे से बाहर निकालते
हुए बोला, ‘हो गई तसल्ली आपकी? अभी इतना वक्त नहीं है जल्दी जल्दी एक एक को अन्दर
भेजो, एक एक बंदा कुबड़े के यह छड़ी मरेगा और दूसरे दरवाज़े से बाहर निकल जायेगा’.
फ़ौरन ही यह सिलसिला शुरू हो गया, सबसे पहले शुरुआत इमाम साहब ने ही की, फिर
बुजुर्ग ने, फिर सल्लू पनवाड़ी ने उसके बाद रियाज़ कोयले वाला, बस एक आदमी कुबड़े के
कमरे में दाखिल होता, उसके पलंग के किनारे पडी उसकी छड़ी उठता और एक प्रहार कुबड़े
पर करता, कुबड़ा जोर से चिल्लाता, कर्राहता हुआ टूटा फूटा बोलता ‘मुझे माफ़ कर दो’.
पूरे गाँव में इस बात की बिन कही मुनादी हो गयी. जो भी कुबड़े से फ़ारिग होता जाता
दूसरे को जल्दी से अन्दर जाने के लिए कहता, कुछ जोशीले लडके मौके का फायदा उठा एक
की जगह फटाफट दो छड़ियों कुबड़े को जोर जोर से जड़ देते और फुर्ती से सरक जाते.
अभी कोई सत्तर पिचहत्तर लोगों छड़ी ही
कुबड़े को पडी होंगी कि छडी पड़ने के बाद उसकी सनदिया आवाज़ आना बंद हो गयी. फिर भी
लोगों को लगता कि मरने वाले की इच्छा का आदर हर हाल में किया जाना चाहिए. सूरज
पूरा चढ़ चुका था, अभी यह सिलसिला ख़त्म न हुआ था कि हवलदार अब्दुल्लाह और रहमत सिपाही
ने कुबड़े को गाँव वालों के हाथों मार पड़ते देख जिला मुख्यालय में सूचना फौरन भेजने
का बंदोबस्त किया. कुछ ही घंटों में जिले से पुलिस की भारी कुमुक पहुँच गयी. नीली
पड़ चुकी कुबड़े ब्याजी की लाश कब्ज़े में लेकर मामले की तहकीकात के बाद गाँव के हर
बालिग को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. गिरफ्तार हुए इमाम साहब ने चलती गाडी से
माथा पीटते हुए वह थैली भी फेंक कर मारी जिसमे मुल्लाह ने हज़ार दीनार बताये थे.
इमाम ने पाया कि वे दीनार नहीं टिन की टिक्कियों पर चांदी के वर्क लगे थे. पुलिस
एक बार फिर मुल्लाह नसरुद्दीन की तलाश में व्यस्त हो चुकी थी, उसके घर से कबूतरों
का बीट भरा खाली दडबा और उसके गधे का सूखा
हुआ कुछ चारा ही बरामद किया जा सका.
रचनाकाल : जौलाई २६,२०१५
गधे को जुलाब का बदला।
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