Wednesday, July 29, 2015

मुल्लाह नसरुद्दीन का फ़ैसला



एक दिन  मुल्लाह नसरुद्दीन राजा बुरहान के दरबार में कोई जुगत भिड़ा कर  पहुँच गया. वहां किसी मसले पर चल रही बहस में उसने दबा-दबा कर पूरे बारह के बारह इमामों के हवाले से कानूनी चौके छक्के जड़ दिए. राजा उसके इल्म से बहुत प्रभावित हुआ और उसे एक शहर का काज़ी मुक़र्रर कर दिया.
अगले दिन मुल्लाह नसरुद्दीन की अदालत में एक कैदी को पेश किया गया, सरकारी पक्ष ने आरोप पढ़े, मुल्लाह कैदी से बोला, ‘तुम्हे क्या कहना है कहो?’
कैदी थर-थर काँप रहा रहा था, बोलते हुए उसकी जुबान लडखडा रही थी, साँसे थाम कर बोला, ‘हुजूर मुझे राजा और उसकी अदालतों, इंसाफ पर पूरा ऐतमाद है’
इतना सुनते ही मुल्लाह नसरुद्दीन अपनी कुर्सी से उछल पड़ा और फ़ौरन कटघरे में खड़े कैदी के पास पहुँच गया. नसरुद्दीन की इस हरकत को पूरी भरी अदालत बेपनाह ताज्जुब से मुँह खोले देख रही थी. मुल्लाह नसरुद्दीन कैदी से गले मिला उसके हाथ चूमे, फिर गले मिला फिर हाथ चूमे, सात–आठ बार ये कसरत करके मुल्लाह अपनी जज की कुर्सी पर फिर आ बैठा, फैसला लिखते समय गंभीरता की लकीरे उसके चेहरे पर उतर आयी थी. फटाफट फ़ैसले पर दस्तखत करके उसने लिखा गया सफा अदालत में पढ़ कर सुनाया.
‘कैदी को फ़ौरन से पेश्तर पागल खाने भेजा जाता है’

रचनाकाल: २९ जुलाई २०१५ 

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