Tuesday, February 7, 2017

आरक्षण : मुल्लाह का जवाब

मुल्लाह नसरुद्दीन सुबह सुबह गधे की सानी कर रहा था . उसे जल्दी कही जाना था, अहाते में उसे देख पडौसी मुसद्दी दीवार फांद के आ गया और पहली फुर्सत में अपना सवाल दाग दिया.
'मुल्लाह, ये बताओ आजकल आरक्षण आरक्षण सभी चिल्ला रहे हैं, ये मसला है क्या ?
'मुल्लाह जल्दी में था, सरपट जवाब दिया- जो आरक्षण का हिमायती मिले उसे एक , जो मुखालिफ मिले उसे दो'
मुल्लाह का जवाब सुनकर मुसद्दी का मुंह खुला का खुला रह गया , ‘ एक और दो - लेकिन क्या ?
अबे झापड़ और क्या देगा- उन मर्दूदो को'
मुल्लाह अपने कमरे के दरवाजे की तरफ तेजी से बढ़ ही रहा था कि मुसद्दी के खून का दौरा तेज हुआ, उसने मुल्लाह का लपक कर हाथ पकड़ लिया - 'अन्दर बाद में जाना पहले इसकी वजह बता देना प्लीज'
मुल्लाह बोला 'सुन मुसद्दी - आरक्षण के हिमायती को एक झापड़ इसलिए काफी है कि उस नादान को पता ही नहीं कि इस दौर में नौकरियां दी नहीं छीनी जा रही है, जब नौकरी ही नहीं तो आरक्षण किस चीज का ?
और मुखालिफ को दो क्यों ?
वह इसलिए कि वो हरामखोर है. सदियों से हड्डियाँ चूस रहे हैं, अब वही हड्डियाँ हुक्मरान दूसरों के आगे फेंकने लगे तो ये भूखे कुत्तों के तरह भौंक रहे हैं. पहले वाले को भले ही छोड़ देना, लेकिन दो वाले का हक़ उसे जरुर देना.’
मुसद्दी सर के बाल नोचता अपने घर से जिस तरह आया था उसी तरह वापस चला गया.


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