बेरोज़गारी,
ग़ुरबत और रोज़
रोज़ बीवी के तानों से आज़िज
होकर मुल्लाह नसरुद्दीन ने
चुनाव का पर्चा भर दिया था,
भला भाषण देने
में उसे कौन पछाड़ सकता था?
जब बोलता तो
मुखालिफों के छक्के छुड़ा देता,
जनता को वक्त
पड़ने पर हंसाने और रुलाने के
सारे दांव मुल्लाह को आते थे
सो मुल्लाह चुनाव जीत गया.
पढ़ा-लिखा,
ज्ञानी,
वाकपटु तो था
ही सो वज़ारत भी मिल गयी.
अब
चुनाव कोई राजा की गद्दी तो
है नहीं कि एक बार मिली तो बन्दे
की मय्यत के साथ ही कुर्सी का
दामन छूटे . मुल्लाह
सत्ता के मद और अपनी सालों की
गर्दिश से पीछा छुटाने यानि
माल कमाने में इतना ताबड़तोड़
मशगूल हुआ कि जिन्होने वोट
देकर उसे चुना था उसी आवाम को
भूल गया. फिर
एक दिन उसके अर्दली ने बताया
कि हुजूर चुनाव की तारीखों
का ऐलान हो चुका है, बहुत
से धुरंधर मुल्लाह के चुनाव
क्षेत्र में पहले से ही अड्डा
जमाये बैठे हैं. चुनाव
का नाम सुनकर मुल्लाह के होश
उड़ गए, यकायक
उसके ज़हन में पिछले चुनाव की
तकरीरे और किये गए वायदे किसी
फिल्म की तरह उसके दिमाग के
पर्दे पर चलने लगे. हकुमत
की नाकामयाबी और आवाम की बदहाली
के बीच जैसे युद्ध शुरू हो
चुका था. हकुमत
के वजीर जब किसी जलसे में जाते
तो जूतों की शक्ल में जनता का
गुस्सा मंच तक दस्तक देने
पहुँच जाता. मुल्लाह
बहुत परेशान था, आखिर
सियासत को छोड़ा भी तो नहीं जा
सकता, नेता
और विधवा का रोना एक ही है.
रांड तो रह ले,
रंडवे कहाँ
रहने दें?
मुल्लाह
ने कागज की पर्ची पर एक तारीख
लिखी और अपने अर्दली को दी,
मुल्लाह की
पर्ची इस बात का ऐलान था कि
फला दिन मुल्लाह नसरुद्दीन
अपने चुनाव क्षेत्र में आवाम
को खिताब करेंगे . मुक़र्रर
तारीख से ठीक दो दिन पहले
मुल्लाह सुबह-सुबह
तहसील पहुँच गया. सारे
पटवारी, कानूनगो
और यहाँ तक तहसीलदार सब हाजिर
हो गए. मुल्लाह
के साथ उसके मुहल्ले के गबर
-जबर
दर्जनभर लौंडे भी साथ थे.
मुल्लाह तहसील
के बड़े से मैदान के एक कोने
में जाकर खड़ा हो गया.
अपने कंधे पर
टंगे एक बड़े से थैले को जमीन
पर रखकर उसने एक सीधी लकीर
अपनी छड़ी से खींची. मुल्लाह
के पीछे पीछे आये लडके और तहसील
वालों का अमला गुपचुप मुंह
बाए यह सब देख रहा था, ये
माजरा है क्या इसे समझने की
कशमकश उनके चेहरों पर साफ़ पढी
जा सकती थी.
लकीर
खींच कर मुल्लाह ने ज़मीन पर
रखे थैले को पलट दिया,
जिसमे तकरीबन
हर किस्मे के जूते थे.
मुल्लाह ने
लड़कों की तरफ इशारा किया और
एक-एक को
लाइन पर खड़ा करके एक-एक
जूता मैदान में फेंकने को
कहा. पहला
जूता जब जमीन पर पड़ा,
मुल्लाह ने
एक पटवारी को बोला , 'नापों
कितनी दूर गिरा है' . पटवारी
ने फीता लगाया, झटपट
पैमाईश की, 'सरकार
३७ फीट'. बरहाल
इस जूता फेंक प्रतियोगिता
में एक बिलल्ले से लडके ने ५५
फीट जूता फेंक कर मुल्लाह से
नकद २० रुपये का इनाम पाया.
रुपये देते
हुए मुल्लाह ने उस लडके की कमर
थपथपाते हुए कहा, ' बरखुरदार
दूध घी भी खाये पीये होते तो
जरुर ७५ फीट फेंक देते'.
मुल्लाह
ने सभी लड़को को पांच-पांच
रूपये देकर विदा किया और
तहसीलदार को बुलाया, उसे
एक तरफ ले जाकर कहा ' मंच
की ऊंचाई पांच फीट हो और बैरीकेट
की दूरी ८० फीट'

