मुल्लाह
नसरुद्दीन बेरोज़गारी के लंबे दौर से जब उक्ता गया, तब उसने शहर बदलने की ठान ली,
मनहूस बग़दाद उसे दो वक्त की रोटी मुहय्या न करा सका. एक दिन उसने अपना बिस्तर बोरिया
बाँध कर अपने गधे के हवाले कर दिया और कूफ़ा पहुँच गया. रास्ते भर उसका दिमाग इसी
काम में लगा रहा कि वह कूफ़ा में आखिर करेगा क्या? कूफ़ा की सरहद पर क़दम रखते ही
उसने फ़ैसला कर लिया कि वह इस शहर में हिकमत करेगा, कूफ़ा पहुँचते पहुँचते उस पर
इतनी रेत चढ़ चुकी थी कि उसका हुलिया किसी मजदूब सा हो गया था. बढ़ चुकी दाढ़ी से उसके
दानिश्वर होने का गुमान और गहरा गया था. कुल मिलकर उसका हुलिया ऐसा कतई नहीं था
जिस हुलिए में मुल्लाह नसरुद्दीन पिछली बार कूफ़ा आया था. लिहाज़ा कूफ़ा और मुल्लाह एक
दूसरे के लिए अब नए थे. एकदम
तरोताज़ा.
अपने मदरसे की
पढाई के दौरान शहर के एक हकीम के मतब में उसने हिकमत के कुछ नुस्खे सीख लिए थे,
खडूस हकीम ने उसे कोई तालीम तो दी नहीं थी बस इमाम दस्ते में कुश्ते कूटते कूटते,
नंबर वाले डिब्बों में रखी हुई जडी बूटियों की पहचान उसे जरुर हो गयी थी. मरीज से
उसका मर्ज़ पूछ कर उसने उसे डिब्बे के नंबर से जोड़ कर याद कर लिया था, कि बुखार का
डिब्बा नंबर सात, पेट दर्द का बारह, खांसी का आठ तो महिलाओं के कमर दर्द का डिब्बा
उन्नीस. गरज ये कि उसे ६०-७० डिब्बों की जडी बूटियाँ और उनसे जुडी बीमारियों का
इल्म हो गया था. क्योकि वह मरीजों को दवाईयों की पुडिये खुद देता था सो उसे यह पता
चल ही गया कि मिगदार कितनी देनी है.
कूफा पहुँचते ही
मुल्लाह नसरुद्दीन ने शहर काज़ी को पटा कर अपने दवाखाने का उदघाटन करा लिया, काज़ी
ने नमाज़ के दौरान मुल्लाह नसरुद्दीन की तारीफ में बड़े कसीदे पढ़े, फिर क्या - कुछ
ही दिनों में मुल्लाह का दवाखाना मरीजों से पट गया. एक से एक बिगड़ा हुआ केस उसके
पास आने लगा, मुल्लाह को जब मसला समझ में न आता तो वह अपनी तुरत बुद्दि का
इस्तेमाल कर बीमारी को अगर ख़त्म न कर सकता तो उसे बाँध जरुर देता. मरीज को उससे भी
राहत ही मिलती, कि चलो हालत बिगड़ तो नहीं रही, इस सुकून में उसके कुछ दिन और कट
जाते.
चालाक मुल्लाह ने
अपने मतब को बडी तरकीब से सजाया था, बाहर एक बड़ा आँगन जिसमे एक कुआँ, फिर एक
दुबारी जिसमे मरीज आकर बैठते फिर अन्दर दवाओं का कमरा जिसकी दीवारों की अलमारियों
में डिब्बे रखे रहते, उसके दाई तरफ का कमरा उसके सहायक का और बांयी तरफ का कमरा जिसमे
वह खुद बैठता. अंगान से उसके कमरे में पहुँचते पहुंचते इतना अँधेरा हो जाता कि कोई
मुल्लाह का चेहरा न देख पाता. एक छोटी सी डिबिया ऐसे जलती कि मुल्लाह अपने मरीज का
मुँह देख सके लेकिन मरीज मुल्लाह को साफ़ साफ़ न दिखे. मुल्लाह के कारिंदे मरीजों को
उस तक कायदे से पहुंचाते कहीं अँधेरे में ठोकर न खा बैठे.मरीज को बैठाने से पहले
कारिन्दा मरीज का नाम और उम्र मुल्लाह को बताता.
एक दिन दोपहर
मुल्लाह अपने सोने के कमरे में दाखिल ही होने वाला था कि उसके कारिंदे ने गुजारिशी
लहजे में आवाज़ दी, ‘हकीम जी, एक मरीज़ और
देख ले, ये तीन घंटे इंतज़ार नहीं कर सकते क्योकि इन्हें कहीं जाना है’
मुल्लाह अपनी
गद्दी पर फिर वापस आ बैठा, कारिंदे ने नाम बताया, असग़र उम्र बावन साल.
मुल्लाह ने
दोबारा पूछा, क्या बताया? कारिंदे ने इस बार और ऊँची आवाज़ में अपनी बात दोहराई.
मुल्लाह ने धीरे से जवाब दिया ‘ठीक है’ कारिन्दा कमरे से बाहर निकल गया.
मुल्लाह इससे
पहले कि मरीज़ से पूछता, वह खुद ब खुद शुरू हो गया, ‘हकीम जी मेरे चेहरे पर बाईं
तरफ़ तीन दिनों से चींटियाँ सी चल रही हैं, रात को नींद भी नहीं आ रही, बहुत परेशान
हूँ. कारोबार के सिलसिले में मुझे एक हफ्ते बाद
लंबे सफ़र पर दमिश्क जाना है सोचा आपसे दावा ही ले लूं’
मुल्लाह ने झटपट
अपने पास रखे कुछ डिब्बे टटोले और उन्हें पुडियो में बाँधा, नुस्खों की पुडिये
मरीज़ के हाथ में थमाते हुए बोला, आज क्या दिन है ?
‘हुजूर जुमेरात
है’.
‘हूँ, बहुत अच्छे
वक्त आये हो, ये तीन पुडिये है, यानि तीन दिन की दवा, दोपहर का खाना खाने के बाद
ताज़े पानी के साथ खानी है’.
मरीज ने फुर्ती
से पुडिये ली चलने की तैय्यारी में उठा ही था कि मुल्लाह की आवाज़ फिर आयी.
‘सुनिए, अभी बात
पूरी नहीं हुई, दवाई खाने के बाद आप सीधे इब्न बतूता बाज़ार के बीच में अमाल सुनार
की दुकान के बाहर रखी बैंच पर बैठ कर आधा घंटे अपनी बाईं आँख थोड़े थोड़े वक्फे के
बाद दबाते रहेंगे. लगातार तीन दिन तक. इतवार को फिर आइयेगा’
मरीज़ ने पूरी बात
ध्यान से सुनी, हामी भरी, सलाम किया और रुखसत हो गया.
असग़र खाना खा ही
चुका था सो एक खुराक दवा की खा कर सीधा इब्न बतूता बाज़ार पहुँच गया, अमाल सुनार की
दुकान मशहूर थी सो उसकी दुकान ढूँढने में उसे दिक्कत न हुई, उसकी दुकान पर औरतों
की बहुत भीड़ रहती, खासकर जुमेरात और जुमे के दिन तो उसके यहाँ मेला सा लगा रहता,
किसी को जेवर खरीदने होते तो किसी को धुलवाने तो किसी को गहनों की टूट फूट की
मरम्मत करानी होती.
असग़र बेंच पर बैठ
कर तसल्ली के साथ थोड़ी थोड़ी देर के बाद अपनी बाईं आँख दबाने का कार्यक्रम शुरू कर
चुका था, अभी कोई दस मिनट ही हुए होंगे कि अमाल की दुकान में औरतों के दरम्यान
खुसर पुसर होने लगी. थोड़ी ही देर में औरतों का एक रेला असग़र पर टूट पड़ा जिसके हाथ
में जो आया उसे उसके बांय गाल पर दे मारता. असग़र कुछ बता पाता, कुछ कहने की कोशिश
करता तब तक सांय सांय चपत उसके गाल पर पड़ते रहे.
असग़र किसी तरह
अपनी जान बचा कर वहां से भागकर सीधे मुल्लाह नसरुद्दीन के मतब पर पहुंचा. उसका
चेहरा सूज चुका था, खासकर बांया गाल फूल कर किसी गुब्बारे जैसा हो चुका था.
मुल्लाह के कारिंदों ने उसे फ़ौरन से पेश्तर उसके सामने पेश कर दिया. असग़र को देखते
ही मुल्लाह उछल पड़ा. वो कुछ बोलने की कोशिश करता कि मुल्लाह ने उसे खामोश किया.
‘अरे तीन दिन का
इलाज एक ही दिन में करवा लिया’ ? सुनो अब दोबारा वहां मत जाना. मेरी पूड़ियों में
कलुवा भड़भूजे की अंगीठी की राख थी, असली इलाज तो वही था जो अमाल सुनार की दुकान पर
हुआ. जाओ तीन दिन में ठीक हो जाओगे, गरम पानी से चेहरे की सिकाई करते रहना’.
मुल्लाह की बात
सुनकर असग़र चलने लगा तो मुल्लाह ने फिर धीरे से पूछा, ‘तुम्हारी बेटी गज़ाला कैसी
है’?
‘बहुत खुशहाल है,
माशाल्लाह तीन बच्चे है अब उसके’ असग़र सलाम करके विदा हुआ और मुल्लाह नसरुद्दीन नेएक
गहरी ठंडी सांस भरी.
दरअसल, दस साल
पहले मुल्लाह जब कूफ़ा में बर्तन बेचने का कारोबार करता था, तब उसकी मुलाकात गज़ाला
से हुई थी, दोनों बेपनाह मोहब्बत करते थे, मुल्लाह नसरुद्दीन जब असग़र से उसकी बेटी
का हाथ मांगने पहुंचा तब असग़र से उसे थप्पड़ मार कर ज़लील करते हुए घर से निकाल दिया
था. मुल्लाह नसरुद्दीन ने टूटे हुए दिल के साथ कूफ़ा से विदा ले ली थी.
रचनाकाल : २४
अगस्त २०१५
चित्र साभार :
गूगल



