Wednesday, August 26, 2015

मुल्लाह नसरुद्दीन : दास्ताने हिकमत


मुल्लाह नसरुद्दीन बेरोज़गारी के लंबे दौर से जब उक्ता गया, तब उसने शहर बदलने की ठान ली, मनहूस बग़दाद उसे दो वक्त की रोटी मुहय्या न करा सका. एक दिन उसने अपना बिस्तर बोरिया बाँध कर अपने गधे के हवाले कर दिया और कूफ़ा पहुँच गया. रास्ते भर उसका दिमाग इसी काम में लगा रहा कि वह कूफ़ा में आखिर करेगा क्या? कूफ़ा की सरहद पर क़दम रखते ही उसने फ़ैसला कर लिया कि वह इस शहर में हिकमत करेगा, कूफ़ा पहुँचते पहुँचते उस पर इतनी रेत चढ़ चुकी थी कि उसका हुलिया किसी मजदूब सा हो गया था. बढ़ चुकी दाढ़ी से उसके दानिश्वर होने का गुमान और गहरा गया था. कुल मिलकर उसका हुलिया ऐसा कतई नहीं था जिस हुलिए में मुल्लाह नसरुद्दीन पिछली बार कूफ़ा आया था. लिहाज़ा कूफ़ा और मुल्लाह एक  दूसरे के लिए अब नए थे. एकदम तरोताज़ा.  
अपने मदरसे की पढाई के दौरान शहर के एक हकीम के मतब में उसने हिकमत के कुछ नुस्खे सीख लिए थे, खडूस हकीम ने उसे कोई तालीम तो दी नहीं थी बस इमाम दस्ते में कुश्ते कूटते कूटते, नंबर वाले डिब्बों में रखी हुई जडी बूटियों की पहचान उसे जरुर हो गयी थी. मरीज से उसका मर्ज़ पूछ कर उसने उसे डिब्बे के नंबर से जोड़ कर याद कर लिया था, कि बुखार का डिब्बा नंबर सात, पेट दर्द का बारह, खांसी का आठ तो महिलाओं के कमर दर्द का डिब्बा उन्नीस. गरज ये कि उसे ६०-७० डिब्बों की जडी बूटियाँ और उनसे जुडी बीमारियों का इल्म हो गया था. क्योकि वह मरीजों को दवाईयों की पुडिये खुद देता था सो उसे यह पता चल ही गया कि मिगदार कितनी देनी है.
कूफा पहुँचते ही मुल्लाह नसरुद्दीन ने शहर काज़ी को पटा कर अपने दवाखाने का उदघाटन करा लिया, काज़ी ने नमाज़ के दौरान मुल्लाह नसरुद्दीन की तारीफ में बड़े कसीदे पढ़े, फिर क्या - कुछ ही दिनों में मुल्लाह का दवाखाना मरीजों से पट गया. एक से एक बिगड़ा हुआ केस उसके पास आने लगा, मुल्लाह को जब मसला समझ में न आता तो वह अपनी तुरत बुद्दि का इस्तेमाल कर बीमारी को अगर ख़त्म न कर सकता तो उसे बाँध जरुर देता. मरीज को उससे भी राहत ही मिलती, कि चलो हालत बिगड़ तो नहीं रही, इस सुकून में उसके कुछ दिन और कट जाते.
चालाक मुल्लाह ने अपने मतब को बडी तरकीब से सजाया था, बाहर एक बड़ा आँगन जिसमे एक कुआँ, फिर एक दुबारी जिसमे मरीज आकर बैठते फिर अन्दर दवाओं का कमरा जिसकी दीवारों की अलमारियों में डिब्बे रखे रहते, उसके दाई तरफ का कमरा उसके सहायक का और बांयी तरफ का कमरा जिसमे वह खुद बैठता. अंगान से उसके कमरे में पहुँचते पहुंचते इतना अँधेरा हो जाता कि कोई मुल्लाह का चेहरा न देख पाता. एक छोटी सी डिबिया ऐसे जलती कि मुल्लाह अपने मरीज का मुँह देख सके लेकिन मरीज मुल्लाह को साफ़ साफ़ न दिखे. मुल्लाह के कारिंदे मरीजों को उस तक कायदे से पहुंचाते कहीं अँधेरे में ठोकर न खा बैठे.मरीज को बैठाने से पहले कारिन्दा मरीज का नाम और उम्र मुल्लाह को बताता.
एक दिन दोपहर मुल्लाह अपने सोने के कमरे में दाखिल ही होने वाला था कि उसके कारिंदे ने गुजारिशी लहजे में  आवाज़ दी, ‘हकीम जी, एक मरीज़ और देख ले, ये तीन घंटे इंतज़ार नहीं कर सकते क्योकि इन्हें कहीं जाना है’
मुल्लाह अपनी गद्दी पर फिर वापस आ बैठा, कारिंदे ने नाम बताया, असग़र उम्र बावन साल.
मुल्लाह ने दोबारा पूछा, क्या बताया? कारिंदे ने इस बार और ऊँची आवाज़ में अपनी बात दोहराई. मुल्लाह ने धीरे से जवाब दिया ‘ठीक है’ कारिन्दा कमरे से बाहर निकल गया.
मुल्लाह इससे पहले कि मरीज़ से पूछता, वह खुद ब खुद शुरू हो गया, ‘हकीम जी मेरे चेहरे पर बाईं तरफ़ तीन दिनों से चींटियाँ सी चल रही हैं, रात को नींद भी नहीं आ रही, बहुत परेशान हूँ. कारोबार के सिलसिले में मुझे एक हफ्ते बाद  लंबे सफ़र पर दमिश्क जाना है सोचा आपसे दावा ही ले लूं’
मुल्लाह ने झटपट अपने पास रखे कुछ डिब्बे टटोले और उन्हें पुडियो में बाँधा, नुस्खों की पुडिये मरीज़ के हाथ में थमाते हुए बोला, आज क्या दिन है ?
‘हुजूर जुमेरात है’.
‘हूँ, बहुत अच्छे वक्त आये हो, ये तीन पुडिये है, यानि तीन दिन की दवा, दोपहर का खाना खाने के बाद ताज़े पानी के साथ खानी है’.
मरीज ने फुर्ती से पुडिये ली चलने की तैय्यारी में उठा ही था कि  मुल्लाह की आवाज़ फिर आयी.
‘सुनिए, अभी बात पूरी नहीं हुई, दवाई खाने के बाद आप सीधे इब्न बतूता बाज़ार के बीच में अमाल सुनार की दुकान के बाहर रखी बैंच पर बैठ कर आधा घंटे अपनी बाईं आँख थोड़े थोड़े वक्फे के बाद दबाते रहेंगे. लगातार तीन दिन तक. इतवार को फिर आइयेगा’
मरीज़ ने पूरी बात ध्यान से सुनी, हामी भरी, सलाम किया और रुखसत हो गया.
असग़र खाना खा ही चुका था सो एक खुराक दवा की खा कर सीधा इब्न बतूता बाज़ार पहुँच गया, अमाल सुनार की दुकान मशहूर थी सो उसकी दुकान ढूँढने में उसे दिक्कत न हुई, उसकी दुकान पर औरतों की बहुत भीड़ रहती, खासकर जुमेरात और जुमे के दिन तो उसके यहाँ मेला सा लगा रहता, किसी को जेवर खरीदने होते तो किसी को धुलवाने तो किसी को गहनों की टूट फूट की मरम्मत करानी होती.
असग़र बेंच पर बैठ कर तसल्ली के साथ थोड़ी थोड़ी देर के बाद अपनी बाईं आँख दबाने का कार्यक्रम शुरू कर चुका था, अभी कोई दस मिनट ही हुए होंगे कि अमाल की दुकान में औरतों के दरम्यान खुसर पुसर होने लगी. थोड़ी ही देर में औरतों का एक रेला असग़र पर टूट पड़ा जिसके हाथ में जो आया उसे उसके बांय गाल पर दे मारता. असग़र कुछ बता पाता, कुछ कहने की कोशिश करता तब तक सांय सांय चपत उसके गाल पर पड़ते रहे.
असग़र किसी तरह अपनी जान बचा कर वहां से भागकर सीधे मुल्लाह नसरुद्दीन के मतब पर पहुंचा. उसका चेहरा सूज चुका था, खासकर बांया गाल फूल कर किसी गुब्बारे जैसा हो चुका था. मुल्लाह के कारिंदों ने उसे फ़ौरन से पेश्तर उसके सामने पेश कर दिया. असग़र को देखते ही मुल्लाह उछल पड़ा. वो कुछ बोलने की कोशिश करता कि मुल्लाह ने उसे खामोश किया.
‘अरे तीन दिन का इलाज एक ही दिन में करवा लिया’ ? सुनो अब दोबारा वहां मत जाना. मेरी पूड़ियों में कलुवा भड़भूजे की अंगीठी की राख थी, असली इलाज तो वही था जो अमाल सुनार की दुकान पर हुआ. जाओ तीन दिन में ठीक हो जाओगे, गरम पानी से चेहरे की सिकाई करते रहना’.
मुल्लाह की बात सुनकर असग़र चलने लगा तो मुल्लाह ने फिर धीरे से पूछा, ‘तुम्हारी बेटी गज़ाला कैसी है’?
‘बहुत खुशहाल है, माशाल्लाह तीन बच्चे है अब उसके’ असग़र सलाम करके विदा हुआ और मुल्लाह नसरुद्दीन नेएक गहरी ठंडी सांस भरी.
दरअसल, दस साल पहले मुल्लाह जब कूफ़ा में बर्तन बेचने का कारोबार करता था, तब उसकी मुलाकात गज़ाला से हुई थी, दोनों बेपनाह मोहब्बत करते थे, मुल्लाह नसरुद्दीन जब असग़र से उसकी बेटी का हाथ मांगने पहुंचा तब असग़र से उसे थप्पड़ मार कर ज़लील करते हुए घर से निकाल दिया था. मुल्लाह नसरुद्दीन ने टूटे हुए दिल के साथ कूफ़ा से विदा ले ली थी.
रचनाकाल : २४ अगस्त २०१५  

चित्र साभार : गूगल 

Wednesday, July 29, 2015

मुल्लाह नसरुद्दीन का फ़ैसला



एक दिन  मुल्लाह नसरुद्दीन राजा बुरहान के दरबार में कोई जुगत भिड़ा कर  पहुँच गया. वहां किसी मसले पर चल रही बहस में उसने दबा-दबा कर पूरे बारह के बारह इमामों के हवाले से कानूनी चौके छक्के जड़ दिए. राजा उसके इल्म से बहुत प्रभावित हुआ और उसे एक शहर का काज़ी मुक़र्रर कर दिया.
अगले दिन मुल्लाह नसरुद्दीन की अदालत में एक कैदी को पेश किया गया, सरकारी पक्ष ने आरोप पढ़े, मुल्लाह कैदी से बोला, ‘तुम्हे क्या कहना है कहो?’
कैदी थर-थर काँप रहा रहा था, बोलते हुए उसकी जुबान लडखडा रही थी, साँसे थाम कर बोला, ‘हुजूर मुझे राजा और उसकी अदालतों, इंसाफ पर पूरा ऐतमाद है’
इतना सुनते ही मुल्लाह नसरुद्दीन अपनी कुर्सी से उछल पड़ा और फ़ौरन कटघरे में खड़े कैदी के पास पहुँच गया. नसरुद्दीन की इस हरकत को पूरी भरी अदालत बेपनाह ताज्जुब से मुँह खोले देख रही थी. मुल्लाह नसरुद्दीन कैदी से गले मिला उसके हाथ चूमे, फिर गले मिला फिर हाथ चूमे, सात–आठ बार ये कसरत करके मुल्लाह अपनी जज की कुर्सी पर फिर आ बैठा, फैसला लिखते समय गंभीरता की लकीरे उसके चेहरे पर उतर आयी थी. फटाफट फ़ैसले पर दस्तखत करके उसने लिखा गया सफा अदालत में पढ़ कर सुनाया.
‘कैदी को फ़ौरन से पेश्तर पागल खाने भेजा जाता है’

रचनाकाल: २९ जुलाई २०१५ 

Tuesday, July 28, 2015

मुल्लाह नसरुद्दीन का इंतकाम: कुबड़ा ब्याजी और उसका गाँव


मुल्लाह नसरुद्दीन को कासिद ने ख़त दिया, पूरा पढ़ा भी नहीं कि भेजने वाले का नाम देखकर ख़त के पुर्जे-पुर्जे कर कूड़ेदान में फ़ेक दिया, उसकी इस हरकत को देख और बुदबुदाने की आवाज़ सुन कर बीवी बोली, ‘क्या था, किसका ख़त था, जो पढ़े बिना ही फाड़ डाला?
‘अरे वही कुबड़ा ब्याजी, कमबख्त पहले कई बार लोगों के जरिये ख़बर भेज चुका था कि आज ख़त भेजा, जाने क्या मार पडी है उस पर खुदा की, कि मुझे बुला रहा है’ मुल्लाह ने झल्लाते हुए जवाब दिया और फिर देर तक उसे मौहल्ले की बेधड़क औरतों की तरह कोसता रहा. अभी एक हफ्ता भी न गुजरा था कि कासिद फिर एक ख़त उसके हाथ में थमाने वाला ही था कि उसकी बीवी ने लपक लिया. पढ़कर बोली, ‘मुल्लाह, मुझे लगता है कि तुम कुबड़े से जाकर मिल ही आओ, वह बीमार है, न जाने कब आँख बंद हो जाये, ऐसी हालत में किसी दुश्मन की गुहार पर भी तवज्जो दी जानी चाहिए, वैसे भी तुम्हारे पास कोई काम धंधा तो है नहीं नाहक ही बग़दाद की गलियों के फर्श घिसते फिरते हो’.
‘मुझे नहीं जाना उस ज़ालिम के पास, मेरी अक्ल मारी गयी थी कि उससे क़र्ज़ ले बैठा, जिसे उतारते उतारते मेरी  आधी उम्र गुजर गयी, अल्लाह अल्लाह करके अब उसका पीछा छूटा है, शक्ल भी नहीं देखनी मुझे उस मरदूद की ...और वो उसका गाँव, कसम खुदा कि एक से एक नुक्तेनापाक आदमी उसके गाँव में हैं, मेरे गधे पर उन्होंने क्या ज़ुल्म किया था, तुम चाहती हो मैं उसे भूल जाऊं? हरगिज़ नहीं, न मुझे कुबड़े की शक्ल देखनी है और न उसके गाँव जाना है’.
चिडचिडी जुबान में मुल्लाह एक सांस में अपना गुबार उतार कर घर से बाहर निकल गया, उसकी बीवी कुछ कहती कि उसका मुँह खुला ही रह गया. मुल्लाह को पता था कि बात चलेगी तो रात हो जायेगी इसलिए उसने रवानगी पकड़ ली. दिन छिपे मुल्लाह भूख से तड़पता घर पहुंचा तो उसकी बीवी ने उसे खाना खिलाया. मुल्लाह खाना खा कर पलंग पर लेटा  तो बीवी पंखा झलने लगी. उसने मौका ताड़ कर कहा. ‘देखो किन्हा रखना अच्छा नही, कुबड़ा शदीद बीमार है, जाने किस बात का बोझ उसके दिल पर हो? क्या पता उसके दिल में मरते वक्त रहम उतर आया हो और वो गलती सुधारना चाहता हो? हो सकता है तुम से ब्याज में ऐंठी रकम ही वापस कर दे. कुछ पैसे मिल जाएं तो घर में दो वक्त की रोटी चल जायेगी, सारे मर्तबानों की तलियाँ अब मुँह चिढाने लगी है’
घर के मौजूदा सूरते हाल का जिक्र सुन कर मुल्लाह को रातभर नींद न आयी, सुबह नहा धो कर, तैयार होकर पेटभर खाना खाया, अपनी गठड़ी गधे पर टांगी और रुखसती से पहले अपनी बीवी से बोला, ‘रफीकन तेरे कहने पर जा रहा हूँ, वर्ना मेरा कोई इरादा नहीं था. जल्दी निकलता हूँ, कुबड़े के गाँव पहुँचते-पहुँचते शाम हो जायेगी, खुदा हाफ़िज’
कुबड़ा ब्याजी उसके बचपन का मित्र हुआ करता था, दोनों एक ही उस्ताद और एक ही मदरसे में पढ़े थे, नसरुद्दीन मुल्लाह बन गया और कुबड़े ने अपनी शारीरिक अक्षमता के चलते व्यापारियों, गाँव और आस पास के देहात में लोगों  को ब्याज पर कर्जे देने का धंधा कर लिया, कुछ ही दिनों में वह महाजन बन बैठा. मुल्लाह की मुल्लाह गिरी कभी बहुत तेज़ दौडती तो कभी उसका सांस फूलने लगता, एक बार ऐसे ही आड़े वक्त में उसे कुबड़ा याद आया, सोचा कि पुराना दोस्त है मदद कर देगा, लेकिन कुबड़े ने अपने धंधे के उसूलों में दोस्ती की परवाह किये बगैर मुल्लाह का घर, खेत, जायदाद गिरवी रखने के बदले २०० दीनार का कर्ज मुल्लाह को बड़ी हील हुज्जतों के बाद  दिया. मुल्लाह ने मुद्दतों कुबड़े को ब्याज दिया लेकिन मूल रक़म कभी न उतरी. इत्तेफाक से उसकी बीवी रफीकन की अम्मी मरने से पहले एक पोटली छोड़ गयी. रफीकन ने जब पोटली खोलकर देखी तो उसमे ७०० दीनार निकले. मुल्लाह ने पहली फुर्सत में लाख लानतें देकर कुबड़े का  हिसाब साफ़ किया. जिस दिन वह अपना हिसाब करने कुबड़े के गाँव गया तभी गाँव के कुछ लड़कों ने मुल्लाह के गधे को जुल्लाब दे दिया. मुल्लाह दस्त लगे बीमार, अधमरे गधे के साथ तीन दिनों में गिरते पड़ते अपने घर पहुंचा उस सफ़र के दौरान उसने कुबड़े के गाँव नसीरपुर में कभी वापस न जाने का अहद भी किया .
नसीरपुर गाँव के मुहाने पर ही पुलिस चौकी थी, हवलदार अब्दुल्लाह ने दूर से ही गधे पर आती हुई सवारी को ताड़ना शुरू कर दिया था. ’अबे रहमत, ये राहगीर नसीरपुर जायेगा या सीधा निकल जायेगा’ अब्दुल्लाह ने सिपाही से पूछा, ‘हुजूर मुझे तो लगता है ये गाँव में ही रुकेगा’ खैर थोड़ी देर में दूर से आती हुई सवारी का आकार बढ़ने लगा. अब्दुल्लाह और रहमत एकटक गधे पर आती हुई सवारी को देखते रहे.
‘अरे ये तो मुल्लाह नसरुद्दीन लग रहा है’ अब्दुल्लाह आँखे गोल करते हुए बोला, ‘हां साहब मुझे भी वही आफ़त दिखाई दे रही है, खुदा खैर करे’. मुल्लाह ने अपना गधा चौकी के आहते में बाँधा और अब्दुल्लाह से दुआ सलाम की. अब्दुल्लाह ढलते हुए दिन में अपने खून ए दौरा को  बढ़ाने वाली ख़बर को खुद अपनी आँखों से देख रहा था. मालूम हुआ कि मुल्लाह की सवारी आज कुबड़े के पास ही रुकेगी. मुल्लाह वक्त ज्यादा बर्बाद किये बिना ही गाँव की तरफ रवाना हो गया, अब्दुल्लाह और रहमत देर तक अपना सर खुजाते उसे आँखों से ओझल होने तक देखते रहे.
मुल्लाह कुबड़े ब्याजी के घर जब पहुँचा तब दिन ढल चुका था, दरवाजे की दस्तक सुनकर कुबड़े का सेवक आया. कुबड़ा बीमार हालत में निर्जर पड़ा था, मुल्लाह को देख कर उठने की कोशिश करने लगा, नौकर ने सहारा देकर, कमर के नीचे जैसे तैसे तकिये लगा कर उसे पलंग पर बैठाया. मुल्लाह को देखकर उसकी आँखों भर आयी, नौकर को इशारा करके उसने खाने की व्यवस्था कराई. मुल्लाह जल्दी जल्दी खाना खा कर कुबड़े के सिराहने जा बैठा. इससे पहले कि वह कुछ बातें करे , कुबड़े ने नौकर को अपने घर जाने का इशारा कर दिया.
मुल्लाह नसरुद्दीन और कुबड़ा ब्याजी देर रात तक पास बैठे खुसपुसाते रहे, मुल्लाह ही बोलता कुबड़ा हाँ हूँ ही कर पाता, सोने से पहले उसने अपने तकिये के नीचे से एक थैली निकाल कर मुल्लाह के हाथ में देते वक्त बहुत  देर तक मुल्लाह का हाथ अपने हाथों में थामे रखा.
अगले दिन सुबह नमाज़े फजिर में मुल्लाह ने गाँव की मस्जिद में ऐलान किया कि  उसका दोस्त कुबड़ा ब्याजी बहुत बीमार है और गाँव के प्रत्येक व्यक्ति से वह अपने किये गए अमानवीय व्यवहार, ज़ुल्म की माफ़ी मांगता है, उसे माफ़ कर दें. कुबड़े की आख़िरी ख्वाइश यह है कि गाँव के लोग अगर उसे माफ़ कर दे तो मरने से पहले उसके शरीर पर एक लाठी जरुर मारें, तभी कुबड़े को भरोसा होगा कि गाँव वालों ने उसकी करतूतों के लिए उसे माफ़ कर दिया. कुबड़े ने गाँव की मस्जिद और मदरसे को १००० दीनार दान भी दिए है, कहते हुए मुल्लाह  ने एक थैली इमाम के क़दमों में डाल दी. मुल्लाह का ऐलान एक तरफ और थैली का बोझ एक तरफ. इमाम ने थैली संभालते हुए फ़ौरन व्यवस्था कर दी. ‘चलो भाइयो, इससे पहले कि देर हो जाये, कुबड़े की अंतिम इच्छा हमें जरुर पूरी करनी पड़ेगी, कभी मरने के बाद उसकी रूह गाँव वालों को सताए’
इमाम की बात सुनकर सभी गाँव वाले कुबड़े ब्याजी के घर की तरफ बढे. रास्ते में एक बुजुर्ग ने सवाल किया, कि ‘मुल्लाह की बात का भरोसा क्यों किया जाए ? कुबड़ा अगर अभी मरा नहीं तो अपने मुँह से माफी मांगे और जो उसे कहना है अपने मुँह से कहे’.
मुल्लाह ने फ़ौरन उस बुजुर्ग बूढ़े की कलाई पकड ली, ‘जरुर, मैं आपको और इमाम साहब को कुबड़े के पास पहले लेकर चलूँगा ताकि तुम उससे बात कर सको’
मुल्लाह गाँव के सारे हुजूम को कुबड़े के घर के बाहर खड़ा कर इमाम और बूढ़े बुजुर्ग को लेकर कुबड़े के कमरे में दाखिल हुआ और घुसते ही कुबड़े की छड़ी हाथ में लेकर बोला, कुबड़े, गाँव वालों ने तुझे माफ़ कर दिया और टोकन के रूप में गाँव का हर बालिग आदमी तुझे तेरी ही छड़ी से मारने को तैयार है. चल उठ और बाहर चल’.
कुबड़े के चेहरे की सलवटों में आते जाते भावों को कोई पढ़ नहीं पाया, वह अधमरा सा हाथ से छडी न लेने का इशारा करता हुआ कुछ बोल पाए, कि मुल्लाह बोला, ‘ठीक है तू बाहर नहीं जा सकता, मैं उनके ही अन्दर आने का इंतज़ाम करता हूँ’.
मुल्लाह, इमाम और बुजुर्ग बूढ़े को धकेलते हुए कुबड़े के कमरे से बाहर निकालते हुए बोला, ‘हो गई तसल्ली आपकी? अभी इतना वक्त नहीं है जल्दी जल्दी एक एक को अन्दर भेजो, एक एक बंदा कुबड़े के यह छड़ी मरेगा और दूसरे दरवाज़े से बाहर निकल जायेगा’.
फ़ौरन ही यह सिलसिला शुरू हो गया, सबसे पहले शुरुआत इमाम साहब ने ही की, फिर बुजुर्ग ने, फिर सल्लू पनवाड़ी ने उसके बाद रियाज़ कोयले वाला, बस एक आदमी कुबड़े के कमरे में दाखिल होता, उसके पलंग के किनारे पडी उसकी छड़ी उठता और एक प्रहार कुबड़े पर करता, कुबड़ा जोर से चिल्लाता, कर्राहता हुआ टूटा फूटा बोलता ‘मुझे माफ़ कर दो’. पूरे गाँव में इस बात की बिन कही मुनादी हो गयी. जो भी कुबड़े से फ़ारिग होता जाता दूसरे को जल्दी से अन्दर जाने के लिए कहता, कुछ जोशीले लडके मौके का फायदा उठा एक की जगह फटाफट दो छड़ियों कुबड़े को जोर जोर से जड़ देते और फुर्ती से सरक जाते.
अभी कोई सत्तर पिचहत्तर  लोगों छड़ी ही कुबड़े को पडी होंगी कि छडी पड़ने के बाद उसकी सनदिया आवाज़ आना बंद हो गयी. फिर भी लोगों को लगता कि मरने वाले की इच्छा का आदर हर हाल में किया जाना चाहिए. सूरज पूरा चढ़ चुका था, अभी यह सिलसिला ख़त्म न हुआ था कि हवलदार अब्दुल्लाह और रहमत सिपाही ने कुबड़े को गाँव वालों के हाथों मार पड़ते देख जिला मुख्यालय में सूचना फौरन भेजने का बंदोबस्त किया. कुछ ही घंटों में जिले से पुलिस की भारी कुमुक पहुँच गयी. नीली पड़ चुकी कुबड़े ब्याजी की लाश कब्ज़े में लेकर मामले की तहकीकात के बाद गाँव के हर बालिग को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. गिरफ्तार हुए इमाम साहब ने चलती गाडी से माथा पीटते हुए वह थैली भी फेंक कर मारी जिसमे मुल्लाह ने हज़ार दीनार बताये थे. इमाम ने पाया कि वे दीनार नहीं टिन की टिक्कियों पर चांदी के वर्क लगे थे. पुलिस एक बार फिर मुल्लाह नसरुद्दीन की तलाश में व्यस्त हो चुकी थी, उसके घर से कबूतरों का बीट भरा खाली दडबा  और उसके गधे का सूखा हुआ कुछ चारा ही बरामद किया जा सका.
रचनाकाल : जौलाई २६,२०१५                                                           

Sunday, July 19, 2015

मुल्लाह नसरुद्दीन : पेशगी गुनाहों की तौबा


मुल्लाह नसरुद्दीन नमाज़े फ़जिर से फ़ारिग होकर जब अपने घर वापस लौटा तो रोज़मर्राह की तरह उसकी जवान बेटी दुबारी में बैठी कुरआन पढ़ती मिलती, अब्बा के आने की आहट पर वह हड़बड़ी में अपने कमरे की तरफ़ फुर्ती से लपकी ही थी कि अब्बा ने पानी के एक गिलास की फरमाइश कर दी. रहल पर खुले कुरआन को देख मुल्लाह से रहा न गया, उसी सफे से उसने कुरआन शरीफ़ पढ़ना शुरू कर दिया.

मुल्लाह अभी दो आयतें भी न पढ़ सका था कि उसके सामने रेशमी रुमाल में लिपटा एक पत्थर आ पड़ा, जिसे उसने फौरन लपक कर जेब में रख लिया, इतने में मुल्लाह की बेटी सबा पानी लेकर आ गयी, मुल्लाह ने गट-गट कर पानी पिया और अपने कमरे की तरफ़ तेज़ी से बढ़ा.

मुल्लाह ने कमरे का दरवाज़ा बंद कर सबसे पहले अपनी जेब से रुमाल में लिपटा पत्थर निकाला, रुमाल के अन्दर उसकी बेटी के लिए प्रेम पत्र था, पत्र को पढ़ कर मुल्लाह के होश फ़ाख्ता हो गए, वह उछल कर फिर एक बार दुबारी में पहुँचा और गौर से मुआयना करने पर उसे दूसरे पत्थर भी पड़े दिखाई पड़े. मुल्लाह पूरे दिन परेशान रहा, रात भर सर खुजाते खुजाते गुजरी अगले दिन जुमे की नमाज़ के वक्त उसने अपने ख़ुतबे में ऐलान किया कि आज से हम अपने पेशगी गुनाहों की तौबा करेंगे. मुल्लाह ने ताकीद की कि पहले मैं करूँगा फिर उसके बाद सफ के दाहिने सिरे से हर नमाज़ी अपने पेशगी गुनाहों की तौबा करेगा.

नमाज़ के बाद सलाम फेर कर मुल्लाह बोला, ‘या अल्लाह, मैं मुल्लाह नसरुद्दीन वल्द नूरुद्दीन अपने पेशगी गुनाह का ऐतराफ़ करता हूँ, मजीद को अपने कारवां के साथ गए हुए पूरे छः महीने हो चुके हैं, उसके जीने की नहीं तो मरने की ख़बर जरुर भिजवा दे ताकि मैं उसकी बेवा रिहाना से निकाह कर सकूं, रिहाना मेरी बचपन की मोहब्बत है, सूदखोर व्यापारी मजीद के जंजाल में फंस गयी है, अगर वह अपने कारवां पर किसी हमले का शिकार हो गया हो, फौत हो गया हो तो ये ख़बर हम तक जल्दी भिजवा, रिहाना से निकाह के बाद मैं सामने वाली पहाडी पर एक शानदार हवादार मस्जिद, बनवाऊंगा, जिसमे आने जाने वाले राहगीर रुक भी सकेंगे, गर्मी में मन लगा कर तेरी इबादत भी करेंगे, मेरी दुआ कबूल फरमा, ये अगर गुनाह है तो उसे माफ़ फरमा’, नमाज़ियों ने एक सुर में कहा ‘आमीन’

मुल्लाह के बाद सफ के दाहिने हाथ से नमाज़ी मेहरबान ने अपना सिलसिला शुरू किया फिर दूसरे ने फिर तीसरे ने. एक के बाद एक नमाज़ी ने आने वाले कल में उनसे जो गुनाह होने वाले थे उसके लिए माफ़ी मांगने का सिलसिला शुरू किया. पूरे कस्बे में कौन किसके माल पर, जायदाद पर, धन दौलत पर नज़रे गढ़ाए बैठा था सारी पोल खुलने लगी. सफ में अपना नंबर आने पर एक नौजवान ने दुआ की, ‘मैं सरफ़राज़ वल्द मुमताज़ अपनी मोहब्बत के जुर्म का ऐतराफ करता हूँ, मेरी मोहब्बत के दुश्मन मुल्लाह नसरुद्दीन को जल्दी से इस दुनिया से उठा ले ताकि मैं उसकी बेटी सबा से निकाह कर सकूँ.  अल्लाह मेरे इस पेशगी गुनाह को माफ़ फरमा.” मुल्लाह के अलावा सब नमाज़ियों ने एक सुर में कहा ‘आमीन’.


रचनाकाल: १९ जुलाई,२०१५